सोनिया चौधरी
'सशक्त महिला, सशक्त समाज' देश के विकास में दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। देश में महिलाओं का सशक्तिकरण होना आज की महती आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण यानी महिलाओं की आध्यात्मिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक शक्ति में वृद्धि करना। भारत में महिलाएं शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला व संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान व प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में भागीदारी करती हैं।
भारत का संविधान सभी भारतीय महिलाओं की समानता की गारंटी देता है। राज्य द्वारा किसी के साथ लैंगिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। सभी को अवसरों की समानता प्राप्त है। समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान है। इसके साथ ही, राज्य द्वारा महिलाओं व बच्चों के पक्ष में विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है। भारत सरकार ने 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष (स्वशक्ति) घोषित किया। सन् 2001 में महिलाओं के सशक्तिकरण की नीति पारित की गई।
देश में ना तो महिलाओं को सशक्त बनाने वाली सरकारी योजनाओं की कमी है और ना ही स्त्री विमर्श करने वालों की। फिर भी लगता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह व्यवहारिक जीवन में हमारे आसपास के परिवेश में नजर नहीं आ रहा है।
कुछ योजनाएं और जागरूक करने वाले विज्ञापन समाज में महिलाओं की स्थिति ना तो बदल पाए हैं और ना ही बदल पाएंगे। अगर सामाजिक-पारिवारिक और वैचारिक बदलाव आए तो शायद महिलाओं की समस्याएं कुछ कम हों। साथ ही, विचारों के इस परिवर्तन को व्यव्हार में भी लाया जाए। महिलाएं पंच- सरपंच बन भी जाए तो क्या? अगर उन्हें निर्णय लेने का अधिकार ही ना मिले। या फिर उनके इन अधिकारों को घर के लोग ही छीन लें। ऐसे में सरकारी नीतियां कहां तक सफल हो पाएंगीं? सरकार महिलाओं को हक तो दे सकती हैं पर जब तक उनके अपनों की सोच में परिवर्तन नहीं आता, उनका चौखट से चौपाल तक आने का सफर आसान नहीं है।
हम पढ़ी-लिखी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला को हर तरह से सशक्त और सफल मान लेते हैं। पर क्या महिलाओं के सशक्तिकरण का पक्ष मात्र आर्थिक रूप से सशक्त होना ही है? धन उपार्जन तो यूं भी महिलाएं हमेशा से ही करती आई हैं। आज भी गांव में खेती-बाड़ी में महिलाएं पुरुषों से कहीं ज्यादा श्रम करती हैं। जिसके चलते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अथोर्पार्जन में उनकी भागीदारी है और सदा से ही रही है ।
कभी-कभी लगता है कि हमारे आस-पास बहुत कुछ बदल तो रहा है पर ये बदलाव सतही ज्यादा हैं। महिलाएं कामकाजी तो बन रही हैं पर सुरक्षित घर लौट आने की गारंटी नहीं है। एक पढ़ी-लिखी मां भी बेटी को जन्म देने का निर्णय खुद नहीं कर सकती। यही वजह है कि जो बदलाव आए हैं, वे भी पूरी तरह से महिलाओं के पक्ष में ही हों ऐसा नहीं है। इसीलिए वैचारिक बदलाव जब तक हमारे व्यव्हार का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण का नारा बस खेल ही बन कर रह जाएगा।